एकलव्य सीधा-सादा लेकिन साहसी बालक था। सब उसे बहुत पसंद करते थे, लेकिन फिर भी वो खुश नहीं था।
एक दिन उसके पिता ने देखा कि एकलव्य हमेशा चुपचाप और सोच में डूबा रहता है। उन्होंने पूछा —
"बेटा, क्या बात है? तुम उदास क्यों रहते हो? शिकार पर जाना तुम्हें पसंद है, फिर भी अपने दोस्तों के साथ क्यों नहीं जाते?"
एकलव्य ने धीरे से जवाब दिया —
"पिताजी, मैं धनुर्विद्या सीखना चाहता हूँ। मैं गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा लेना चाहता हूँ। कहते हैं उनका गुरुकुल एक जादुई जगह है, जहाँ से आम बच्चे भी वीर योद्धा बन जाते हैं।"
पिता चुप थे, लेकिन एकलव्य ने आगे कहा —
"मुझे पता है आप क्या सोच रहे हैं, पिताजी। हम वनवासी हैं, लेकिन मैं पूरी जिंदगी केवल शिकारी नहीं बनना चाहता। मैं एक शक्तिशाली धनुर्धर बनना चाहता हूँ। क्या आप मुझे द्रोणाचार्य के गुरुकुल भेजेंगे?"
पिता को चिंता हुई, पर उन्होंने बेटे के सपने का सम्मान किया। आशीर्वाद दिया और कहा —
"जाओ बेटा, अपने लक्ष्य को हासिल करो।"
एकलव्य जंगलों के बीच स्थित गुरुकुल पहुँचा, जहाँ राजकुमारों को द्रोणाचार्य धनुर्विद्या सिखाते थे। उसने देखा कि कई छात्र अभ्यास कर रहे हैं — लक्ष्य पर तीर चलाना, ध्यान लगाना और सीखना।
कुछ ही दूर गुरु द्रोणाचार्य खड़े थे, एक लड़के को कुछ समझा रहे थे। वो लड़का और कोई नहीं, राजकुमार अर्जुन था।
एकलव्य ने आगे बढ़कर द्रोणाचार्य को प्रणाम किया और कहा —
"गुरुदेव, मैं वनवासी मुखिया का पुत्र एकलव्य हूँ। कृपया मुझे भी अपना शिष्य बना लें।"
गुरु द्रोणाचार्य ने उसकी बात सुनकर मुँह फेर लिया और बोले —
"तुम शूद्र हो, और मैं ब्राह्मण। मैं केवल राजपरिवार के बच्चों को सिखाता हूँ।"
राजकुमार अर्जुन ने भी गुस्से में कहा —
"यह गुरुकुल तुम्हारे जैसे के लिए नहीं है! बाहर निकलो यहाँ से!"
एकलव्य बहुत आहत हुआ। पर उसने हार नहीं मानी।
उसने सोचा —
"ईश्वर ने ज्ञान में कभी भेद नहीं किया, तो मैं क्यों हार मानूं?"
वापस जंगल में जाकर एकलव्य ने मिट्टी से द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई और उसे सच्चे मन से अपना गुरु मानकर रोज़ तीरंदाज़ी का अभ्यास करने लगा।
उसकी लगन रंग लाई। एक दिन एक भौंकते हुए कुत्ते ने अभ्यास में बाधा डाली। एकलव्य ने बिना उसे नुकसान पहुँचाए सात तीरों से उसका मुँह बंद कर दिया।
यह चमत्कार देखकर अर्जुन और द्रोणाचार्य भी चकित रह गए। उन्होंने उस अद्भुत तीरंदाज़ को खोजा — और सामने आया एकलव्य!
द्रोणाचार्य ने पूछा —
"तुम्हें इतनी अच्छी धनुर्विद्या किसने सिखाई?"
एकलव्य ने विनम्रता से कहा —
"गुरुदेव, मैंने आपसे ही सीखा है।"
द्रोणाचार्य को याद आया कि यह वही बालक था जिसे उन्होंने शिष्य मानने से मना कर दिया था।
अब अर्जुन को गुस्सा आया क्योंकि गुरु ने उसे वचन दिया था कि वही सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर बनेगा।
द्रोणाचार्य ने सोचा और बोले —
"अगर तुम मुझे अपना गुरु मानते हो, तो मुझे गुरु दक्षिणा दो।"
एकलव्य ने श्रद्धा से कहा —
"गुरुदेव, बताइए — मैं क्या दूँ?"
गुरु ने कहा —
"मुझे तुम्हारे दाएँ हाथ का अंगूठा दो।"
सभी चौंक गए। बिना अंगूठे के तीर चलाना असंभव था। पर एकलव्य मुस्कराया, झुका और बिना कुछ कहे अपने दाएँ हाथ का अंगूठा काटकर गुरु को समर्पित कर दिया।
द्रोणाचार्य की आँखों में आँसू थे। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया —
"एकलव्य, तुम बिना अंगूठे के भी महान धनुर्धर रहोगे। आने वाली पीढ़ियाँ तुम्हारे त्याग और समर्पण को याद रखेंगी।"
एकलव्य की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची लगन, अनुशासन और श्रद्धा से हम किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं। सच्चा ज्ञान पाने के लिए जाति, धर्म या वर्ग कोई मायने नहीं रखता।
The Story of Ekalavya | Literature Reader | STD-6 CBSC
